जिस समय दिल्ली में दंगे और हिंसा हुए पूरा मीडिया और गृहमंत्री आज संसद में एक तरफ दंगों में दिल्ली पुलिस के द्वारा की गई कानून व्यवस्था की तारीफ़ की वो सराहनीय हैं किंतु शायद मंत्री जी और मीडिया बार-बार यह भूल जाते हैं कि इस हिंसा में मारे घायलों के लिए जो दिन रात भूख प्यास त्यागकर सेवा में केवल नर्सिगकर्मी ही खड़े नजर आये।।
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(राकेश बडगुजर की कलम से)
रात का डेरा हो या दिन का उजाला जैसे ही मरीज के रिश्तेदार भागते हुए मुंह से चीख पुकार के साथ जीटीबी हॉस्पिटल के गेट पर पहुंचे हैं तो वहां से उनकी स्वास्थ्य सेवा में चिकित्साकर्मी और नर्स ही नजर आए ।। भागते हुए नर्स का साथ देने के लिए तुरंत डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी भी जुट जाते है। ये केवल कहानी नही अपितु दिल्ली में हुई हिंसा से घायलों जीटीबी हॉस्पिटल में इलाज़ के समय का दृश्य हैं।।
यही हाल आज कोरोना जैसी विश्वव्यापी महामारी के समय देखने को मिल रहा है।। आज के परिदृश्य में केवल नर्सिंगकर्मी और चिकित्सा कर्मी ही है जो मरीज से दूरी न बनाकर इस महामारी में उसके पास खड़ा मिलेगा । आज सबको पता है कि चिकित्सा कर्मी और नर्सिंग कर्मी ही इस महामारी में सबसे ज्यादा खतरे में है परंतु यह सब जानते हुए भी उसे अपने कर्तव्य बोध का ज्ञान है कि आज समाज के लिए उसकी जिम्मेदारी स्वयं के स्वास्थ्य और जान से प्रमुख हैं।।


दिल्ली में हुए हिंसा दंगे शायद वर्षों तक भूला नहीं जा सके, और न याद करना चाहेगा । पूरी दिल्ली को जिस तरह  दो महीने से एक कमरे में बंद देखा गया शायद कभी न देखा जाएगा और नहीं ही भारत और दिल्ली कभी पीछे मुड़कर इसको देखना चाहेगा।। 


जिस समय दिल्ली में दंगे और हिंसा हुए पूरा मीडिया और गृहमंत्री आज संसद में एक तरफ दंगों में दिल्ली पुलिस के द्वारा की गई कानून व्यवस्था की तारीफ़ की वो सराहनीय हैं किंतु शायद मंत्री जी और मीडिया बार-बार यह भूल जाते हैं कि इस हिंसा में मारे घायलों के लिए जो दिन रात भूख प्यास त्यागकर सेवा में केवल नर्सिगकर्मी ही खड़े नजर आये।। स्वास्थ्य व्यवस्था प्रबंधन में जीटीबी हॉस्पिटल के नर्सेज और चिकित्साकर्मी ने जिस तरह से काम किया शायद सीमा पर खड़े सैनिकों से कम न था।। सभी ने धर्म , जाति,  घर परिवार सब कुछ भूल कर नर्सिंगकर्मी जिस तरह सरकार कि साथ जनता की सेवा में खड़े नजर आए शायद कोई अखबार मीडिया न दिखाये।। व्यक्ति अस्पताल में भर्ती होता है और स्वस्थ होकर लौटता है तो उसे याद रखने के लिए अस्पताल का नाम और ज्यादा से ज्यादा डॉक्टर के  नाम याद रहता है। किंतु नर्सिंग कर्मी द्वारा किया कार्य शायद ही कोई याद करता हो। नर्सिंग कर्मी नाम और प्रसिद्धि से दूर हमेशा उसी जिम्मेदारी से लगे होते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य निस्वार्थ भावना से मरीज की सेवा करना है ।
आज दुनिया का सबसे इमानदार व्यवसाय नर्सिंग को ही माना गया। नर्सिंग के स्वभाव में राजनीति नहीं,  उसमें स्वार्थ भी नहीं हैं , पैसे या अन्य किसी चीज का प्रलोभन भी नहीं नर्सिंग ही एक ऐसा समुदाय हैं जो हॉस्पिटल की रीढ़ की हड्डी माना जाता है नरसिंह के कार्य क्षेत्र को शायद एक वाक्य में समेट पाना किसी के बस का नहीं।।
आज दिल्ली में हुए हिंसा प्रदर्शन में चिकित्सा व्यवस्था को जिस तरीके से नर्सिंग कर्मचारियों और चिकित्सकों ने सामना किया वो सराहनीय तो है ही साथ ही वो आज कई सवाल सरकार पर भी खड़े करता हैं जैसे (हाई रिस्क)ज़ोखिम भत्ता, और अन्य वेतन विसंगति जैसी सुविधाओ से अभी भी नर्सेज मरहूम हैं।।आज भी सरकारी अस्पतालों में भारी मात्रा में नर्सेज के पद ख़ाली हैं, गत कई वर्षों में सरकार ने हॉस्पिटल में स्वास्थ्य सुविधाएं और बेड संख्या तो बढ़ाई किन्तु नर्सेज के नियमित पद आज भी वर्षो से खाली पड़े हैं जिसका प्रभाव आज कही न कही नर्सेज की कार्यक्षमता पर भी पड़ता हैं।। मरीज नर्स का अनुपात बढ़ता जा रहा है जिससे स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ भी कमज़ोर होती हैं।।


किन्तु आज जिस तरह से नर्सेज ने इस विश्व युद्ध जैसी स्वास्थ्य आपातकाल में डटकर सामना किया शायद सरकार को सोचने को मजबूर करे।। शायद सरकार भविष्य में अब इन सब विषयों पर संज्ञान ले।।



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